श्रीकृष्ण जन्मभूमि, मथुरा

​​​​​​​श्रीकृष्ण की जन्मभूमि

श्रीकृष्ण जन्मभूमि एक भव्य आकर्षण मन्दिर के रूप में स्थापित है। पर्यटन की दृष्टि से विदेशों से भी भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन के लिए यहाँ प्रतिदिन आते हैं। भगवान श्रीकृष्ण को विश्व में बहुत बड़ी संख्या में नागरिक आराध्य के रूप में मानते हुए दर्शनार्थ आते हैं।

इतिहास

भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि मथुरा के मल्लपुरा मोहल्ले में स्थित है। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा पुरी में हुआ और संभवत: इसी कारण वह भारत की सात मोक्षदायिनी पुरियों में मानी गई, परंतु मथुरा पुरी का इतिहास भगवान श्रीकृष्ण से भी पुराना है।

पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार भगवान श्रीराम के छोटे भाई शत्रुघ्न जी ने लवण दैत्य का वध कर मधुरा नामक पुरी की स्थापना की थी। वह 'मधुरा' आगे चलकर 'मथुरा' के नाम से प्रसिद्ध हुई, जहां क्रूरकर्मी राजा कंस के कारागार में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ।

स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा शिक्षा प्राप्त

विद्वानों के अनुसार आज का 'कटरा केशवदेव' ही कंस कारागार एवं प्राचीन मथुरा केंद्र स्थान है। श्री ग्राउस तत्कालीन जिलाधीश के अनुसार कटरा केशवदेव तथा उसके आसपास दिखाई पड़ने वाले खंडहरों पर ही मथुरा बसी हुई थी। स्वामी दयानंद सरस्वती ने मथुरा में ढाई साल रहकर स्वामी विरजानंद से धर्मग्रंथों को पढ़ा था। मथुरा के चारों ओर 130 किमी. तक घेरा ब्रज मंडल कहलाता है।

प्रथम मंन्दिर

प्राचीन कथा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ ने अपने कुलदेवता की स्मृति में इस स्थान पर प्रथम मंन्दिर बनवाया था। पुरातत्व की दृष्टि से सबसे पुराना शिलालेख महाक्षत्रप शोडास के समय (पू. 80-57) क मिला है। यह ब्राह्मी लिपि में लिखा हुआ है, जिससे पता चलता है कि शोडास के राज्यकाल में वसु नामक व्यक्ति श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर एक मंदिर, तोरण द्वार और वेदिका का निर्माण कराया था।

दूसरा मंदिर

दूसरा मंदिर 400 ई. के लगभग सम्राट विक्रमादित्य के शासनकाल बना। उस समय मथुरा नगरी संस्कृति एवं कला की बड़ी केंद्र थी और यहां हिंदू धर्म के साथ-साथ बौद्ध तथा जैन का उत्कर्ष था।

1017 में सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य द्वारा निर्मित इस भव्य मंदिर को महमूद गजनवी ने लूटा और तोड़ा। विशाल मंदिर का तथा मथुरा की तत्कालीन समृद्धि का वर्णन स्वयं महमूद गजनवी के मीर मुंशी अल् उतवी अपनी 'तारीखे-यामिनी' नामक पुस्तक इस प्रकार किया है- "शहर बीचोबीच में एक बहुत बड़ा आलीशान मंदिर था, सबसे ज्यादा खूबसूरत था, जिसे लोग इंसान का न मानकर देवदूतों बनाया मानते थे। उसका बयान लफ्जों या तस्वीरों से नहीं किया जा सकता।"

तृतीय मन्दिर

संस्कृत के एक शिला लेख से ज्ञात होता है कि महाराजा विजयपाल देव जब मथुरा के शासक थे, तब सन् 1150 ई॰ में जज्ज नामक किसी व्यक्ति ने श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर एक नया मन्दिर बनवाया था। यह विशाल एवं भव्य बताया जाता हैं। इसे भी 16 वीं शताब्दी के आरम्भ में सिकन्दर लोदी के शासन काल में नष्ट कर डाला गया था। 1515 के लगभग श्री चैतन्य महाप्रभु इस मंदिर में आए थे। 

चतुर्थ मन्दिर

1725 में जहाँगीर के शासन काल में ओरछा के शासक राजा वीरसिंह देव बुन्देला ने उसी स्थान पर तैंतीस लाख रुपये की लागत से लगभग 250 फीट ऊंचा एक दूसरा भव्य मंदिर बनवाया और उसके चारों ओर ऊंची प्राचीर बनवाई, जिसका कुछ भाग अभी तक अवस्थित है। उस प्राचीर के दक्षिण-पूर्व कोनों में एक विशाल कुआं और उसके ऊपर एक ऊंचे बुर्ज का निर्माण हुआ। वह कुआं और बुर्ज आज भी विद्यमान है। इटैलियन यात्री मनूची के अनुसार केशव देव मंदिर का स्वर्ण शिखर इतना ऊंचा था कि वह 58 किमी. दूर आगरा से भी दिखाई देता था। दीपावली की रात में जब इस पर दीपक जलाये जाते थे, तब  उनका प्रकाश आगरा से अच्छी तरह दिखाई पड़ता था और बादशाह उसे देखा करते थे। मनूची भारत में बहुत समय तक रहे और उन्हें कई बार केशव देव जी मंदिर के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उसे 1669 में मुगल बादशाह औरंगजेब ने मंदिर को नष्ट कर दिया।

जन्मस्थान का पुनरुद्वार

1803 में मथुरा का प्रदेश ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत आ गया। 1815 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने कटरा केशव मंदिर को देव को नीलाम कर दिया, जिसे बनारस के तत्कालीन राजा पटनीमल ने खरीदा। पंडित मदनमोहन मालवीय श्री जुगल किशोर जी बिड़ला की आर्थिक सहायता से इसे 7 फरवरी, 1944 को राय कृष्णदास जी से 13,000 रुपये देकर जन्मस्थान की संपूर्ण भूमि प्राप्त कर ली। सेठ जुगल किशोर जी बिड़ला ने 21 फरवरी, 1951 को श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट की स्थापना की और कटरा केशव देव पर उस ट्रस्ट अधिकार हो गया। इसके पश्चात् सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट के अंतर्गत एक संस्था जन्मस्थान सेवा संघ' सेवा संस्थान) से पंजीकृत कराया गया। श्री जुगल किशोर बिड़ला ने श्री जयदयाल जी डालमिया श्रीकृष्ण जन्मस्थान के विकास एवं मंदिरों के दायित्व सौंप दिया।

गर्भगृह तथा भव्य भागवत भवन का पुनरुद्धार

भगवान श्रीकृष्ण की इस पवित्र जन्मभूमि पर निर्माण एवं सौंदर्यीकरण के निमित्त एक धनराशि सुप्रसिद्ध औद्योगिक घराना डालमिया परिवार द्वारा दानस्वरूप प्रदान की गई है। श्री जयदयाल डालमिया के बाद विष्णुहरि द्वारा संस्थान का कार्य देखा जा रहा है। श्री अखंडानंद सरस्वती के सभापतित्व काल में मथुरा के युवक 15 अक्टूबर 1953 रूप में कटरा केशव देव के कार्य में जुट गए। बरसों तक कार्य चलता रहा,  श्री बाबूलाल बजाज श्री फूलचंद खंडेलवाल के नेतृत्व में इसके बाद गर्भगृह तथा भव्य भागवत भवन का पुनरुद्धार व निर्माण कर आरंभ होकर फरवरी, 1982 में सम्पन्न हुआ।

मंदिर का भव्यरूप 

मंदिर एवं मंदिर के परिसर का क्षेत्रफल 12 एकड़ है। भागवत-भवन के अत्तुग्डं शिखर वैसे तो यात्री को दूर से ही आकर्षित करते हैं, परन्तु वे जैसे ही सीढ़ियों से चढ़कर मुख्य सभा मण्डप के नीचे वाले प्लेटफार्म पर पहुँचते हैं तो वहाँ से भागवत भवन का बाहरी दृश्य उन्हें और भी आकर्षित करने लगता है। सभी द्वारों, गवाक्षों, छज्जों, द्वार शाखाओं एव शिखरस्थ सजावट का भारतीय संस्कृति एवं प्राचीन सांस्कृतिक शिल्प-शैली से शिल्पकारों ने ऐसा सजाया हे कि वे अति मनोरम लगती है। मुख्य मन्दिर का शिखर जन्मभूमि की सतह से लगभग 130 फीट ऊँचा है और छोटे मन्दिरों का शिखर लगभग 84 फीट ऊँचे जन्मभूमि की सतह सड़क से लगभग 20 फीट ऊँची है। अत: इन सबकी ऊँचाई से सड़क की सतह गिनी जाय तो लगभग 20 फीट और बढ़ जाती है। मुख्य मन्दिर के शिखर पर चक्र सहित छह फीट ऊँचे और मन्दिरों पर लगभग ढाई फीट ऊँचे स्वर्ण मण्डित कलश है।

मंदिर में कार्यरत 

मंदिर में 15 पुजारी एवं 280 कर्मचारी तैनात है। मंदिर के परिसर के अंदर एवं बाहर फल, फूल एवं प्रसाद की 100 से अधिक दुकानें हैं। जन सामान्य की सुरक्षा एवं भीड़ को नियंत्रित करने हेतु 1 ए.डी.एम.. 3 एस.डी.एम. 3. सी. ओ. 2 इंस्पेक्टर, 85 सब-इंस्पेक्टर, 400 सिपाही 8 कंपनी पी.ए.सी. एवं सी. आर.पी. 3 प्लाटून कमांडो यानी कुल मिलाकर 1,000 हजार से ज्यादा पुलिस कर्मचारी एवं अधिकारी तैनात हैं।

दर्शन का समय

मंदिर के दर्शन का समय गर्मी में प्रातः 5 से 12, सायंकाल 4 से 9.30 बजे एवं सर्दी में प्रात: 5.30 से 12 बजे और सायंकाल 3 से रात्रि 8.30 बजे

महोत्सव

संस्थान द्वारा यमुना पष्ठी, जगन्नाथ रथयात्रा, गुरु पूर्णिमा, काली घटा, कृष्ण जन्माष्टमी, नंदोत्सव, शरद पूर्णिमा, दीपावली, गोवर्धन पूजा, गोपाष्टमी बसंत पंचमी, महाशिवरात्रि एवं लठमार होली के आयोजन प्रतिवर्ष धूमधाम से आयोजित किए जाते हैं। इन सभी कार्यक्रमों में लाखों की भीड़ होती है।

प्रशासनिक अधिकारी

जन्मभूमि के प्रशासनिक प्रमुख श्री कपिल शर्मा है। श्री राजीव श्रीवास्तव सहायक प्रशासनिक अधिकारी हैं। 

सेवा प्रकल्प

श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान द्वारा पुस्तकालय, प्रकाशन विभाग, पत्र व्यवहार विद्यालय, अखंड संकीर्तन, सेवा विश्रामगृह, शिक्षा सदन आयुर्वेदिक चिकित्सालय, सचल चिकित्सालय, गौशाला, शव अंतिम संस्कार सेवा आदि सेवा प्रकल्प संचालित किए जा रहे हैं।

प्रतिदिन दर्शनार्थ

मंदिर में सामान्य दिनों में प्रतिदिन 10 हजार, शनिवार एवं रविवार को 35-40 हजार, सावन-भादो में प्रतिदिन 60-80 हजार, गुरु पूर्णिमा के पांच दिनों में 40 लाख, जन्माष्टमी के दस दिनों में 70-75 लाख एवं संपूर्ण वर्ष में लगभग 3 करोड़ भक्त दर्शन करते हैं।