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पाण्डुलिपि पुस्तकालय

वृन्दावन शोध संस्थान की स्थापना मूल रूप से पांडुलिपियों के संग्रह, संरक्षण, शोध और प्रकाषन के लक्ष्य को लेकर की गई थी। वस्तुतः श्रीकृष्ण की जन्म और लीलास्थली होने के कारण प्रारम्भ से ही भक्तों और तीर्थयात्रियों का आकर्षण और श्रद्धा का केन्द्र स्थल रहा है। देष के विभिन्न प्रान्तों में उपजी भक्ति धारा का केन्द्र बिन्दु होने के साथ ही चैतन्य, वल्लभ, निम्बार्क, रामानुज सहित निकुंजोपासक राधावल्लभीय और हरिदासी सम्प्रदायों के अनगिनत भक्त रचनाकार ब्रज में निरन्तर आते रहे तथा ब्रज वृन्दावन में कालिन्द नन्दिनी यमुना के सुरम्य तटों पर कदम्ब, तमाल, वृन्दा और करील की वृक्षावलियों तथा लता-पताओं के मध्य बैठकर श्रीकृष्ण की लीला माधुरी का रसास्वादन कर ग्रन्थ लेखन का कार्य करते रहे। महाप्रभु चैतन्य, महाप्रभु वल्लभ, महाप्रभु निम्बार्क आदि सहित अनेकानेक वैष्णव आचार्यों तथा सम्प्रदाय प्रवर्तक तथा उनके अनुयायी षड गोस्वामी गण, अष्टछाप के भक्त आदि के साहित्य सृजन का केन्द्र रहा ब्रज क्षेत्र इनके अतिरिक्त रसोपासक स्वामी हरिदास, महाप्रभु हित हरिवंष तथा हरिराम व्यास और उनकी षिष्य परम्परा के स्वनाम धन्य भक्त रचनाकारों ने ब्रज की रेणुका का आश्रय प्राप्त कर अनगिनत ग्रन्थ राषि का प्रमणन किया। यह समस्त ग्रन्थ राषि ब्रज क्षेत्र के विभिन्न मन्दिरों, मठों और आश्रमों के संग्रह में सुरक्षित थी। ग्रन्थों के प्रति अपने आराधन जैसा पूज्य भाव होने के नाते अथवा उनके दुरूपयोग की सम्भावना के चलते ये ग्रन्थ स्वामी इन ग्रन्थों को स्वयं के अध्ययन के अतिरिक्त किसी अन्य को देना नहीं चाहते थे। किन्तु समुचित देखरेख और रखरखाव के अभाव में ये ग्रन्थ राषि काल प्रभाव से जर्जर तथा क्षरित होने लगी थी। ये ग्रन्थ स्वामी इन ग्रन्थों को जीर्ण शीर्ण होने की स्थिति में यमुना में प्रवाहित भी कर देते थे, परन्तु किसी को प्रदान करना इन्हें स्वीकार्य नहीं था। वर्ष 1968 में हाथरस निवासी मै0 रामदास गुप्ता ने दुर्लभ ग्रन्थों के संग्रह का पुनीत कार्य इस उद्देष्य से प्रारम्भ किया कि इनका समुचित वैज्ञानिक विधि से संरक्षण सम्भव हो और ये दीर्घ जीवी हो सकें। इसके साथ ही विद्वानों और शोधार्थियों के निमित्त इन्हें अनुसन्धान, सम्पादन आदि के लिए भी सुलभ कराया जा सके ताकि अप्रकाषित और अप्रसारित पांडुलिपियों का शोध और प्रकाषन कराया जा सके। गीता में वर्णित ‘ अक्षराणाम अकारोजस्मि ’ सूत्र वाक्य के आधार पर डाॅ0 गुप्त ने वृन्दावन शोध संस्थान का आधार वाक्य निर्धारित किया ‘‘ ग्रन्थ प्रभु के विग्रह हैं ’’। इसी आधार वाक से प्रेरणा लेते हुए संस्था का यह पांडुलिपि ग्रन्थागार स्थापित किया गया।

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वस्तुतः पांडुलिपि ग्रन्थागार वृन्दावन शोध संस्थान का हृदय स्थल है। इसी ग्रंथागार के माध्यम से संस्थान के अकादमिक गतिविधियों को ऊर्जा प्राप्त होती है। वृन्दावन एवं ब्रज के अनेक मन्दिरों, मठों आदि से संगृहीत ग्रन्थ राषि आज 30,000 से अधिक संख्या में ग्रन्थागार में सुरक्षित हैं। इनमें संस्कृत, हिन्दी, उड़िया, बंगाली, पंजाबी, उर्दू, अरबी एवं फारसी भाषाओं में हस्तनिर्मित कागज, ताड़पत्र, बाँसपत्र, केले की छाल आदि पर लिखित यह ग्रन्थ राषि अपनी प्राचीनता और दुर्लभता का प्रमाण स्वयं देती है। भक्ति काव्य, पुराण, तन्त्र-मन्त्र, ज्योतिष, आयुर्वेद, नीति, व्याकरण, धर्म-दर्षन आदि विषयों में अनेक विख्यात सन्तों, आचार्यों, विद्वानों द्वारा रचित इन पाण्डुलिपियों के अतिरिक्त संस्थान के इस ग्रन्थागार में दुर्लभ दस्तावेजों का भी संग्रह विद्यमान है। इसके अतिरिक्त मध्यकालीन मुगल शासकों के वे फरमान भी सम्मिलित है, जिनके माध्यम से वृन्दावन में मन्दिर निर्माण हेतु सन्तों के जमीन दानस्वरूप प्रदान की गई थी। संस्थान द्वारा शोधार्थियों के उपयोगार्थ संस्कृत, हिन्दी, बंगाली एवं पंजाबी ग्रन्थों के कैटलाॅग्स भी प्रकाषित किये गए हंै। यह कार्य अनवरत जारी है। संस्थान के अतिरिक्त अन्य पाण्डुलिपि संग्रह केन्द्रों से दुर्लभ ग्रन्थों की पहले माइक्रोफिल्म बनाई गई थी। जिनका भी एक कैटलाॅग प्रकाषित किया जा चुका है। वर्तमान में तकनीकी विकास के दृष्टिगत संस्थान की पांडुलिपियों के अतिरिक्त बाहरी संग्रह केन्द्रों के ग्रन्थों का डिजिटाइजेषन भी किया जा रहा है, जो कि शोधकर्ताओं के उपयोगार्थ सुलभ करायी जाती हैं। ग्रन्थागार के माध्यम से शोधार्थियों की शोध जिज्ञासा शान्त करते हुए उन्हेें वांछित मार्गदर्षन प्रदान किया जाता है। शोधार्थियों के निमित्त उनके द्वारा सम्पन्न किये जाने वाले शोध कार्यों के उपयोगार्थ पांडुलिपियों के वांछित पत्रक फोटो प्रिन्ट कराकर नियमानुसार शुल्क लेकर उन्हें सुलभ कराए जाते हैं। इस प्रकार यह ग्रन्थागार शोध कार्यों में विविध माध्यमों से अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर रहा है।

पाण्डुलिपि पुस्तकालय की झलक

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