संस्थापक

डाॅ॰ रामदास गुप्त - परिचय

    वृन्दावन शोध संस्थान के संस्थापक डाॅ.रामदास गुप्त का जन्म 01 अगस्त 1937 को हाथरस (उ.प्र.) में हुआ था। इनकी माता का नाम श्रीमती सत्यवती देवी और पिता का नाम श्री जमुना शरण था। अपने माता-पिता की आठ संतानों, जिनमें तीन भाई श्री रमेशचन्द्र, श्री सियाराम और श्री अवधकिशोर तथा चार बहनों श्रीमती विमला देवी, श्रीमती सुशीला देवी, श्रीमती शकुन्तला देवी और श्रीमती सीता देवी में एक थे डाॅ.रामदास गुप्त। विख्यात भागवत प्रवक्ता पं.कपीन्द्र जी ने डाॅ. गुप्त का नामकरण किया था।

Dr._Ramdas_Gupta


    डाॅ. रामदास गुप्त की प्रारम्भिक शिक्षा हाथरस में ही हुई, उसके बाद उच्च शिक्षा प्राप्त करने हेतु वे इलाहाबाद (वर्तमान प्रयागराज) गए। वर्ष 1962 में वे लन्दन गए, जहाँ वो वि.वि. में हिन्दी के प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हुए। डाॅ. गुप्त प्रारंभ से ही साहित्यानुरागी रहे और कविता लेखन के शौक के चलते अनेक कविताएँ उनके द्वारा रचित की गईं। लन्दन में भी उन्होंने हिन्दी सोसायटी की स्थापना की जहाँ हिन्दी-प्रेमी एकत्र होते और एक दूसरे को कविताएँ सुनते-सुनाते थे। लन्दन में ही 29 दिसम्बर 1965 को उन्होंने श्रीमती रोबिन गुप्ता से विवाह कर लिया। जो स्वयं एक शिक्षिका थीं। साहित्यिक अभिरूचि रखते हुए डाॅ.गुप्त अपने अध्ययन में लगे रहे और भक्तमाल की प्रियादास जी की भक्तिरस बोधिनी टीका पर उन्होंने पी-एच.डी. हेतु शोधकार्य पूर्ण किया। इस पांडुलिपि की आठ पांडुलिपियों से उन्होंने पाठ सम्पादन का कार्य किया, जिनकी समस्त प्रायः प्रतियां इंग्लैंड ग्रंथागारों में भी सुलभ थीं। वृन्दावन में लोई बाजार स्थित अपने पूर्वजों की श्रीनारायण धर्मशाला में वे प्रायः आते रहते थे।  इसी धर्मशाला में विहार पंचमी के शुभ मुहूर्त के अवसर पर 24 नवंबर 1968 को डाॅ.गुप्त के द्वारा नष्ट होती पांडुलिपि संपदा को संरक्षण प्रदान हेतु वृंदावन शोध संस्थान की स्थापना की गई। इस संस्थान का उद्घाटन तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री डाॅ.कर्ण सिंह द्वारा किया गया। वृंदावन शोध संस्थान का उद्देश्य था वृंदावन और ब्रज क्षेत्र में विभिन्न स्थलों पर समुचित संरक्षण के अभाव में क्षरित हो रही पांडुलिपि संपदा का संग्रह और उन्हें वैज्ञानिक संरक्षण प्रदान करने के साथ ही उन्हें शोध कार्य हेतु उपयोग में लाकर प्रकाशित करना। अनेक विद्वान, स्थानीय भक्त और संतजनों ने इस पुनीत कार्य में सहयोग किया और विभिन्न मंदिरों, मठों, आश्रमों आदि को इन ग्रंथो के महत्व से अवगत कराया गया जिसके फलस्वरूप यह ग्रंथ संपदा एकत्रित होती गई। प्रारंभ में डाॅ. गुप्त के द्वारा ही अर्जित संसाधनों से ही श्री नारायण धर्मशाला में संस्थान संचालित होता रहा। कालांतर वर्ष 1984 में रमणरेती स्थित दाऊजी की बगीची में वर्तमान भवन में उत्तर प्रदेश सरकार की वित्तीय सहायता से यह संस्थान स्थानांतरित हुआ। डाॅ.गुप्त का कविता संग्रह ‘गोधूलि बेला’ नामक पुस्तक के माध्यम से प्रकाशित है। इससे पूर्व ब्रज के प्रख्यात विद्वान डाॅ.शरणबिहारी गोस्वामी के साथ वृंदावनीय रसोपासना से संबंधित ग्रंथ ‘रहस्य दर्पण’ और ‘रहस्य चन्द्रिका’ का संपादन भी उन्होंने किया, यह ग्रंथ भी संस्थान द्वारा ही प्रकाशित किया गया।


    वृंदावन के ठा.श्रीबांकेबिहारी जी महाराज में आपकी विशेष आस्था थी तथा विद्वानों से निरंतर संपर्क और उनका सान्निध्य प्राप्त करना डाॅ.गुप्त की प्रमुख रुचियों में था। फलस्वरूप अनेक स्वनामधन्य विद्वानों को वो संस्थान परिदर्शन हेतु भी वे प्रेरित करते रहते थे। इस प्रकार उनके द्वारा ब्रज संस्कृति के संरक्षण तथा ग्रंथ विग्रहों की सेवा का जो स्वप्न देखा गया वह स्वप्न वृंदावन शोध संस्थान के द्वारा निरंतर सार्थक हो रहा है। आज यह संस्थान प्रगति के पथ पर अग्रसर है। 30,000 से अधिक पांडुलिपियों, फरमानों, हस्तनिर्मित चित्रों तथा विविध विषयक मुद्रित ग्रंथों आदि के साथ ही ब्रज संस्कृति संग्रहालय में ब्रज की प्रतिनिधि वस्तुओं को जिज्ञासुओं के प्रदर्शनार्थ प्रदर्शित किया गया है। ब्रज संस्कृति की ध्वजा देश-विदेश में फहराने के अपने लक्ष्य के साथ विद्वानों को, यह संस्थान समर्पित कर 27 जुलाई 1997 में डाॅ.रामदास गुप्त ने अंतिम सांस ली। यह संस्थान देश के प्रमुख अकादमिक संस्थानों में सम्मिलित होकर साहित्य सेवा में संलग्न है।