पुस्तकालय

संस्थान का उद्देश्य ब्रज क्षेत्र में पाण्डुलिपियों एवं अन्य शोध सामग्री का संग्रह एवं संरक्षण तथा उसे देश के विभिन्न भागों व विदेशी विद्वानों को a1उपलब्ध कराना है। संस्थान के संग्रह में अब 30,000 से अधिक संस्कृत, हिन्दी, बांग्ला, उड़िया, गुजराती, उर्दू व पंजाबी भाषाओं की पाण्डुलिपियाँ उपलब्ध हैं तथा इस संग्रह में निरंतर वृद्धि हो रही है। इसके अतिरिक्त यहाँ लगभग 200 लघु चित्र, नागरी एवं फ़ारसी लिपि में 200 ऐतिहासिक अभिलेख, बड़ी संखया में पुराने डाक टिकट, पोस्टकार्ड, लिफाफे, सिक्के व प्रतिमाएँ मौजूद हैं।

संग्रह की अधिकांश पाण्डुलिपियाँ 16वीं से 18वीं शताब्दी की हैं तथा उत्तर भारत के मध्ययुगीन साहित्य के अध्ययन की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। इनमें से कुछ अत्यंत प्राचीन एवं बहुमूल्य हैं, जैसे 1534 ई. की सनातन गोस्वामी की लिखित पाण्डुलिपि। संस्थान के पास बड़ी संख्या में गौड़िय सम्प्रदाय से संबंधित पाण्डुलिपियाँ हैं, जिनमें से अनेक अप्रकाशित हैं। संग्रह की अधिकांश सामग्री गौड़िय सम्प्रदाय के इतिहास एवं साहित्य के a2 लिये विशेष महत्व की है। संस्थान को इस बात पर गर्व है कि उसके पास रूप गोस्वामी, सनातन गोस्वामी, जीव गोस्वामी तथा कृष्णदास कविराज की हस्ताक्षरित पाण्डुलिपियाँ हैं। इनमें प्रथम तीन चैतन्य के समकालीन (1486- 1533 ई.) तथा सम्प्रदाय के संस्थापक हैं। संग्रह में अन्य सम्प्रदायों से संबंधित महत्वपूर्ण पाण्डुलिपियाँ भी हैं, जिनमें निम्बार्क, रामानन्दी, वल्लभी, राधावल्लभी तथा हरिदासी सम्प्रदाय से संबंधित पाण्डुलिपियाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उड़िया, बांग्ला तथा नागरी लिपियों में ताड़पत्रों पर लिखित लगभग 150 पाण्डुलिपियाँ तथा भोजपत्र पर लिखित पाण्डुलिपियाँ भी हैं। इनमें से अधिकांश सचित्र हैं। दुर्लभ एवं महत्वपूर्ण पाण्डुलिपियाँ भी हैं।

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पाण्डुलिपि पुस्तकालय की झलक

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दुर्लभ एवं महत्वपूर्ण पाण्डुलिपियाँ

Roop Goswami bhashak mahatma 7688

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Sanatan Goswami Vishnu Chandra Udaya 474-A

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पाण्डुलिपि ग्रन्थागार

पाण्डुलिपि ग्रन्थागार संस्थान का हृदयस्थल है। पांडुलिपियों के संग्रह, संरक्षण, शोध और प्रकाशन को लक्षित कर स्थापित वृन्दावन शोध संस्थान ने अपने पिछले 5 दशकों की सांस्कृतिक यात्रा में 30,000 से अधिक हस्तलिखित ग्रन्थों को अध्येताओं के लाभार्थ संगृहीत किया है। भारतीय संस्कृति की प्राण संवाहक ब्रज की रसपरक भावधारा से अनुप्राणित संस्कृति के विविध पक्षों से संबंधित ग्रंथों का संग्रह यहां विद्यमान है। धर्म, दर्शन, ज्योतिष, संगीत आदि के साथ ही इस ग्रंथागार में निम्बार्क, गौड़ीय, वल्लभ, राधाबल्लभ, हरिदासी, ललित आदि वैष्णव एवं रसिक सम्प्रदायों के आचार्यों, भक्तों तथा साधक-विद्वानों के वाणी ग्रन्थों का संग्रह इस ग्रन्थागार को ब्रज रस रसिकों, तत्त्व अन्वेषकों, शोधकर्ताओं आदि के लाभार्थ उपयोगी बनाता है। यह ग्रन्थ राशि ब्रज-वृन्दावन के विभिन्न मन्दिरों, मठों एवं आश्रमों आदि के द्वारा संस्थान को दान स्वरूप प्रदत्त की गई हैं। इसके अतिरिक्त ग्रन्थागार में उन महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ों का भी संग्रह है, जो प्राचीन राजाओं, बादशाहों आदि के द्वारा ब्रज के मन्दिरों के निर्माणार्थ राजाज्ञाओं के रूप में सुरक्षित हैं। ब्रज संस्कृति पर विविध विषयपरक अनुसन्धानकर्ता विद्वानों को इस ग्रंथागार के माध्यम से वांछित सामग्री मूल ग्रंथ अथवा डिजिटल रूप में भी अध्ययनार्थ सुलभ करायी जाती है।

ग्रंथागार में सुलभ पांडुलिपियों की स्थिति:

  1. कुल पंजीकृत [Accessioned] पाण्डुलिपियाँ            29359
  2. सूचीपत्रित [Catalogued] पाण्डुलिपियाँ                24107
  • संस्कृत        &    19838

        नागरी लिपि     &    17012

        बंगला लिपि         –    2826

  • हिन्दी/ब्रजभाषा        –    2850
  • गुरूमुखी लिपि         –      40
  • उड़िया ताड़पत्र ग्रंथ    –      74
  • बंगला ग्रंथ        –    1305

दस्तावेज़//फ़रमान [Old Documents]                    260

           (उर्दू, फ़ारसी, बंगला, नागरी)

  1. अनिर्धारित [Un-sorted] पाण्डुलिपियाँ            लगभग    5000
  2.  ग्रंथागार में सुलभ विभिन्न विषयों की पाण्डुलिपियां
वृन्दावन शोध संस्थान
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